Raja Sen Death: बंगाली सिनेमा से रविवार को एक बेहद दुखद खबर सामने आई। राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता मशहूर फिल्म निर्देशक राजा सेन का 70 साल की उम्र में निधन हो गया। उन्होंने कोलकाता के एसएसकेएम अस्पताल में अंतिम सांस ली। लंबे समय से स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों से जूझ रहे राजा सेन की हालत पिछले कुछ दिनों में काफी गंभीर हो गई थी।
उनके निधन की खबर की पुष्टि उनकी पत्नी और अभिनेत्री पापिया सेन ने की है। राजा सेन के जाने से बंगाली फिल्म इंडस्ट्री में शोक की लहर है। प्रसेंजीत चट्टोपाध्याय, ऋतुपर्णा सेनगुप्ता और रंजीत मल्लिक समेत कई कलाकारों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी है।
Raja Sen Death News: एसएसकेएम अस्पताल में हुआ निधन
रिपोर्ट्स के अनुसार राजा सेन लंबे समय से कई स्वास्थ्य समस्याओं से परेशान थे। हाल के दिनों में उनकी तबीयत ज्यादा बिगड़ने के बाद उन्हें कोलकाता के एसएसकेएम अस्पताल में भर्ती कराया गया था।
निमोनिया और सांस लेने में परेशानी के कारण उनकी हालत लगातार गंभीर होती गई। उन्हें वेंटिलेशन पर भी रखा गया, लेकिन डॉक्टरों की तमाम कोशिशों के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका। रविवार, 16 अगस्त 2026 को उनके निधन की खबर सामने आई।
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लंबे समय से स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे थे राजा सेन
राजा सेन की स्वास्थ्य परेशानियां अचानक शुरू नहीं हुई थीं। करीब एक दशक पहले ‘माया मृदंग’ फिल्म की शूटिंग के दौरान उन्हें चोट लगी थी। इस हादसे के बाद धीरे-धीरे उनकी शारीरिक समस्याएं बढ़ती गईं।
रिपोर्ट्स के मुताबिक इस साल उन्हें न्यूरोलॉजिकल समस्या का भी सामना करना पड़ा था और कमर व रीढ़ से जुड़ी समस्या के लिए सर्जरी करानी पड़ी थी। ऑपरेशन के बाद उनकी हालत में कुछ सुधार हुआ था, लेकिन बाद में फिर उनकी तबीयत बिगड़ गई। आखिरकार निमोनिया और सांस से जुड़ी गंभीर परेशानी ने उनकी स्थिति को बेहद नाजुक बना दिया।
कौन थे राजा सेन?
राजा सेन बंगाली सिनेमा के उन निर्देशकों में शामिल थे जिन्होंने फिल्मों में आम इंसान की जिंदगी, परिवार, रिश्तों और भावनाओं को बेहद सहज अंदाज में पेश किया।
उनका जन्म 10 नवंबर 1955 को हुआ था। फिल्मों में पहचान बनाने से पहले उन्होंने टेलीविजन के क्षेत्र में भी काम किया। बाद में उन्होंने बड़े पर्दे का रुख किया और अपनी संवेदनशील कहानी कहने की शैली के कारण अलग पहचान बनाई।
उनके करियर में कई चर्चित फिल्में शामिल रहीं और उन्हें अपने काम के लिए तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी मिले।
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‘दामू’ ने दिलाई खास पहचान
राजा सेन की सबसे चर्चित फिल्मों में ‘दामू’ का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। यह फिल्म 1996 में रिलीज हुई थी और उनकी पहचान को राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाने वाली महत्वपूर्ण फिल्मों में शामिल रही।
फिल्म की कहानी और उसके भावनात्मक ट्रीटमेंट ने दर्शकों का ध्यान खींचा। ‘दामू’ को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। यही वजह है कि आज भी राजा सेन के करियर की चर्चा होती है तो इस फिल्म का नाम सबसे पहले लिया जाता है।
‘आत्मीय स्वजन’ और ‘लैबोरेटरी’ भी रहीं खास
राजा सेन ने सिर्फ एक तरह की कहानियों तक खुद को सीमित नहीं रखा। उनकी फिल्मोग्राफी में ‘आत्मीय स्वजन’ और ‘Laboratory’ जैसी फिल्में भी शामिल हैं।
उनकी फिल्मों की खासियत यह थी कि कहानी में बहुत ज्यादा दिखावे के बजाय पात्रों की भावनाओं और उनके आपसी रिश्तों पर जोर रहता था। यही वजह है कि उनकी फिल्मों में बंगाली मध्यवर्गीय जीवन की झलक काफी स्वाभाविक तरीके से दिखाई देती थी।
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साहित्य और सिनेमा का खूबसूरत मेल
राजा सेन के काम में साहित्य की झलक भी देखने को मिलती थी। वह ऐसी कहानियों को पर्दे पर लाने के लिए जाने जाते थे जिनमें इंसानी रिश्तों और समाज की वास्तविक तस्वीर दिखाई देती थी।
उनके सिनेमा में परिवार, संघर्ष, भावनाएं और आम जिंदगी के छोटे-छोटे पहलू महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। यही संवेदनशीलता उनकी फिल्मों को बाकी फिल्मों से अलग पहचान देती थी।
ऋतुपर्णा सेनगुप्ता ने बताया अभिभावक जैसा रिश्ता
राजा सेन के निधन की खबर से अभिनेत्री ऋतुपर्णा सेनगुप्ता भी बेहद भावुक नजर आईं। उन्होंने राजा सेन को अपने लिए सिर्फ निर्देशक नहीं बल्कि अभिभावक जैसा बताया।
ऋतुपर्णा ने उनके साथ काम करने के पुराने अनुभवों को याद किया और कहा कि राजा सेन को इससे भी ज्यादा सम्मान मिलना चाहिए था। उन्होंने ‘माया मृदंग’, ‘आत्मीय स्वजन’ और ‘पुरातन आर बेला’ जैसी फिल्मों से जुड़ी यादों को भी साझा किया।
उनकी बातों से साफ जाहिर था कि राजा सेन और उनके साथ काम करने वाले कलाकारों के बीच रिश्ता केवल पेशेवर नहीं था।
प्रसेंजीत चट्टोपाध्याय ने दी श्रद्धांजलि
राजा सेन के निधन पर अभिनेता प्रसेंजीत चट्टोपाध्याय ने भी उन्हें श्रद्धांजलि दी। उन्होंने निर्देशक के निधन को बंगाली सिनेमा के लिए बड़ी क्षति बताया।
राजा सेन के साथ काम कर चुके कलाकारों के लिए उनका जाना केवल एक फिल्म निर्देशक को खोना नहीं है। यह उस दौर के एक ऐसे फिल्मकार की विदाई है, जिसने अपनी फिल्मों के जरिए कई कलाकारों और दर्शकों के साथ गहरा रिश्ता बनाया।
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रंजीत मल्लिक ने भी जताया दुख
अभिनेता रंजीत मल्लिक ने भी राजा सेन के निधन पर दुख व्यक्त किया। दोनों के बीच लंबे समय से परिचय था और उन्होंने साथ में काम भी किया था।
राजा सेन को याद करते हुए मल्लिक ने उनके व्यक्तित्व और काम दोनों की सराहना की। उनके निधन से बंगाली फिल्म इंडस्ट्री के पुराने कलाकारों और उनके प्रशंसकों के बीच भी भावुक माहौल है।
राजा सेन की फिल्में क्यों थीं अलग?
राजा सेन की फिल्मों को ध्यान से देखें तो उनमें एक चीज बार-बार दिखाई देती है—कहानी से ज्यादा इंसान पर ध्यान।
उनके किरदार सिर्फ संवाद बोलने वाले पात्र नहीं होते थे। उनके अपने रिश्ते, परेशानियां, उम्मीदें और भावनाएं होती थीं। यही वजह थी कि उनकी कहानियां दर्शकों को अपनी जिंदगी से जुड़ी हुई महसूस होती थीं।
उनकी फिल्में खास तौर पर इन पहलुओं के लिए याद की जाती हैं:
- परिवार और रिश्तों की संवेदनशील कहानी
- आम और मध्यवर्गीय जीवन की झलक
- साहित्य से जुड़े विषय
- मजबूत और वास्तविक किरदार
- बिना अनावश्यक दिखावे के कहानी कहने की शैली
टीवी से शुरू हुआ था सफर
राजा सेन ने अपने करियर की शुरुआत टेलीविजन से की थी। बाद में उन्होंने फिल्मों की दुनिया में कदम रखा और निर्देशन के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई।
उनके शुरुआती टेलीविजन कार्यों में ‘Subarnalata’, ‘Adarsha Hindu Hotel’ और ‘Arogyo Niketan’ जैसे प्रोजेक्ट शामिल रहे। इसके अलावा उन्होंने बंगाल की कला और संस्कृति से जुड़े कई लोगों पर डॉक्यूमेंट्री भी बनाई थीं।
इस तरह उनका करियर सिर्फ फिल्मों तक सीमित नहीं रहा बल्कि टेलीविजन और डॉक्यूमेंट्री के क्षेत्र में भी उनका योगदान रहा।
आखिरी समय तक सिनेमा से जुड़े रहे
राजा सेन के बारे में सबसे खास बात यह रही कि स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों के बावजूद उनकी रचनात्मक रुचि बनी रही।
हाल के समय में भी वह साहित्य और सिनेमा से जुड़े प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहे थे। जुलाई 2026 में शरतचंद्र चट्टोपाध्याय से जुड़ी डॉक्यूमेंट्री के सिलसिले में उनके भागलपुर जाने की खबर सामने आई थी।
यानी जीवन के आखिरी दौर में भी उनका जुड़ाव कहानी, साहित्य और सिनेमा से बना रहा।
तीन राष्ट्रीय पुरस्कारों का सम्मान
राजा सेन का नाम बंगाली सिनेमा के उन चुनिंदा निर्देशकों में लिया जाता है जिन्हें राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी पहचान मिली।
उनके काम के लिए उन्हें तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिले। ‘दामू’, ‘आत्मीय स्वजन’ और उनके दूसरे महत्वपूर्ण कार्यों ने उन्हें बंगाली सिनेमा से आगे राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई।
उनकी यह उपलब्धि बताती है कि उनकी फिल्मों का प्रभाव सिर्फ क्षेत्रीय दर्शकों तक सीमित नहीं था।

Raja Sen News: बंगाली सिनेमा ने खोया संवेदनशील फिल्मकार
राजा सेन का निधन बंगाली सिनेमा के लिए एक बड़ी क्षति है। उन्होंने ऐसी फिल्मों का निर्माण किया जिनमें बड़े-बड़े दावों से ज्यादा इंसानी भावनाओं की अहमियत थी।
आज जब सिनेमा का स्वरूप तेजी से बदल रहा है, ऐसे समय में राजा सेन जैसे फिल्मकार की विरासत और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। उन्होंने दिखाया कि एक अच्छी कहानी को प्रभावशाली बनाने के लिए हमेशा बड़े बजट या भव्य सेट की जरूरत नहीं होती—कभी-कभी एक मजबूत कहानी और सच्चे किरदार ही काफी होते हैं।
Raja Sen Death: हमेशा याद किए जाएंगे उनके काम
70 साल की उम्र में राजा सेन का सफर भले ही खत्म हो गया, लेकिन उनके बनाए किरदार और कहानियां उनके प्रशंसकों के बीच लंबे समय तक जिंदा रहेंगी।
‘दामू’ से लेकर ‘आत्मीय स्वजन’ तक, उनके काम ने बंगाली सिनेमा में एक अलग जगह बनाई। उनके निधन से एक अध्याय जरूर समाप्त हुआ है, लेकिन उनकी फिल्मों के जरिए उनकी रचनात्मक विरासत आगे भी लोगों तक पहुंचती रहेगी।
राजा सेन अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी कहानियां और सिनेमा उन्हें लंबे समय तक याद रखने की वजह देते रहेंगे।